अंधो की संख्या - अकबर बीरबल के मजेदार किस्से

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अकबर और बीरबल के किस्से केवल मजेदार ही नही होते बल्कि उसे पढ़कर हमारी तर्कबुद्धि में भी बढ़ोतरी होती है. ऐसा ही एक किस्सा है जिसका शीर्षक है "अंधो की संख्या". क्या है ये किस्सा और किस तरह बीरबल ने अपने  बुद्धिचातुर्य से अकबर का मन मोह लिया आइए जानते है..

एक बार अकबर दरबार में बैठे हुए थे कि अचानक उनके मन में एक सवाल उठ खड़ा हूआ. दरबार भरा हुआ था और अकबर ने सीधे बीरबल से संबोधन करते हुए कहा, " बताओ, बीरबल हमारे पूरे नगर में किसकी संख्या ज्यादा होगी ? अंधो की जो देख नही सकते ? या उनकी जो अंधे नही है और देख सकते है ?"

इस तरह अचानक भरे दरबार में बीरबल पर आ पड़े इस सवाल से वह हक्के-बक्के रह गए. लेकिन पलभर में स्वस्थ होकर उन्होंने जवाब दिया, "महाराज, इस वक्त फौरन तो आपके सवाल का जवाब दे पाना कठिन है.  हांलाकि इस बारे में मैं निश्चिन्त हूँ कि पूरे नगर में देख सकने वाले व्यक्तियों की संख्या से अधिक अंधे व्यक्तियों की संख्या होगी. "

अकबर : " यह तुम कैसे कह सकते हो ? तुम्हे यह साबित करके दिखाना होगा "

बीरबल : " बिल्कुल, अगर आप मुजे एक दिन की महोलत दें तो मैं इस बात को साबित भी कर दूंगा और इसकी सही सही संख्या भी बता पाऊंगा "

अकबर : " ठीक है, तुम्हे एक दिन का वक्त दिया जाता है "
उस दिन दरबार छूटने के बाद अगले दिन सुबह बीरबल दरबार नही गए बल्कि एक बगैर बनी हुई चारपाई लेकर नगर के मुख्य बाजार में बैठ गए और रस्सी से चारपाई की बुनाई करने लगे. उस वक्त बीरबल के साथ दो आदमी भी थे जी कागज और कलम लेकर बैठे थे.

बीरबल को अकबर के दरबार के बजाय यूं बीच बाजार चारपाई बुनते हुए देख नगरजन आश्चर्यचकित और हैरान रह गए. तथा बीरबल से इस तरह चारपाई की बुनाई करने का कारण पूछने लगे.

बीरबल से जो व्यक्ति भी बुनाई करने की वजह पूछता बीरबल उसका नाम बगल में बैठे आदमी को लिखने को कह देते. ऐसे होते होते आधा दिन गुजर गया और अनेक व्यक्ति बीरबल से मिले, कारण पूछा और बीरबल ने उसका नाम लिखवा लिया.

वहीं दूसरी और दरबार में बीरबल की गैरहाजरी से अकबर बेचैन हो उठे. दरबारियों से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि बीरबल तो नगर के मुख्य बाजार में चारपाई की बुनाई कर रहे है. बीरबल को मन ही मन गुस्सा आया कि मैं यहां दरबार में कल पूछे सवाल के जवाब की प्रतीक्षा कर रहा हूँ और वो बीच बाजार में बुनाई करने के मामूली काम मे व्यस्त है.

अकबर अपने अंगरक्षकों के साथ दौड़े-दौड़े नगर के बाजार पहुंचे. देखा कि बीरबल चारपाई बुनने में इतने व्यस्त हैं कि नजर उठाकर उनकी तरफ देख भी नही रहे. अकबर बीरबल के करीब पहुंचे और पूछा, " बीरबल यह बीच बाजार तूम क्या कर रहे हो, वहां दरबार मे मैं तुम्हारी राह देखते देखते थक गया.. "

बीरबल ने देखा कि अकबर खुद दरबार छोड़कर उनके पास आए है और सवाल कर रहे है. बीरबल ने बगल में बैठे आदमी से अकबर का नाम भी कागज में लिख लेने को कहा.

अकबर ने जब बीरबल से नाम लिखने की वजह पूछी तो बीरबल ने कहा, " आपका नाम उन व्यक्तियों की सूची में लिखा गया है जो आंखे होने के बावजूद अंधे है, क्योंकि आपने देखा कि मैं चारपाई बुन रहा हूँ फिर भी आपने मुझसे सवाल पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ.."

इतना कहकर बिरबल ने बगल में बैठे दोनो आदमियों से कागज लेकर शाह अकबर को दिए फिर बोले, "महाराज, ये लीजिए ये दोनों कागज में उन लोगों की सूची है जो देख सकते है और उनकी भी जो देख नही सकते.

और इसमें मेरे कहे अनुसार देख सकने वाले व्यक्तियों की संख्या से अधिक अंधे व्यक्तियों की संख्या है. ये वह व्यक्ति है जो आंखे होने के बावजूद और ये देखने के बावजूद की मैं चारपाई बुन रहा हूँ मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ.

बीरबल की बात सुनकर अकबर को अपने सवाल का जवाब मिल गया. और इसी तरह बीरबल ने एक बार फिर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया.

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